1791 का काला सच: जब हिंदू सेना ने हिंदू मठ लूटा और मुस्लिम सुल्तान ने बचाया
श्रृंगेरी शारदा पीठ — आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों में से एक, ज्ञान की देवी माँ शारदा का आसीन स्थल। यह मठ सदियों से विद्या, अध्यात्म और शांति का केंद्र रहा। ब्राह्मण पंडितों की तपस्या, शांत वातावरण, और लाखों की संपत्ति — सब कुछ सुरक्षित था, क्योंकि यह युद्ध से दूर, आध्यात्मिक भूमि मानी जाती थी। लेकिन तीसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध (1790-1792) के दौरान, जब मराठा सेना (पेशवा के अधीन, ब्रिटिश और निज़ाम के साथ गठबंधन में) टीपू सुल्तान के खिलाफ मैसूर के क्षेत्रों पर आक्रमण कर रही थी, तब एक भयानक घटना घटी।
अप्रैल 1791 में, मराठा कमांडर रघुनाथ राव 'दादा' कुरुंडवाडकर (परशुराम भाऊ पटवर्धन की सेना से जुड़े) के नेतृत्व वाली टुकड़ी के साथ चलने वाले पिंडारी (लुटेरे अनियमित घुड़सवार) और लामाण (अन्य लुटेरे दल) ने श्रृंगेरी पर छापा मारा।
मठ के मंदिरों को लूटा गया।
शारदा देवी की प्राचीन मूर्ति को अपवित्र किया गया, हटाया गया।
ब्राह्मण पंडितों को पीटा, मारा गया; कई निर्दोष लोग मारे गए।
महिलाओं पर अत्याचार हुए, कई ने आत्महत्या कर ली।
लगभग 60 लाख रुपये की धन-संपत्ति, हाथी, सोना-चांदी, अन्य मूल्यवान वस्तुएं लूटी गईं।
अन्य मंदिरों को भी क्षति पहुंचाई गई, आग लगाई गई — यहां तक कि प्राचीन विष्णु मंदिर भी नहीं बचे।
यह लूट युद्ध के दौरान अवसरवादी पिंडारियों का काम थी, जो मराठा सेना के साथ चलते थे। यह मराठा पेशवा की आधिकारिक नीति नहीं थी, लेकिन सेना के अधीन ही हुआ। बाद में पेशवा ने जांच कराई, कुछ लूट माल जब्त किया, क्षतिपूर्ति का आदेश दिया — पर पूरा नुकसान कभी पूरा नहीं हुआ।
उधर, टीपू सुल्तान (जिनके राज्य में श्रृंगेरी था) ने इस घटना की कड़ी निंदा की। 6 जुलाई 1791 को उन्होंने श्री सच्चिदानंद भारती स्वामी (श्रृंगेरी जगद्गुरु) को पत्र लिखा:
"हमने आपका पत्र प्राप्त किया और मामले की गंभीरता समझ ली। मराठा राजा की घुड़सवार सेना ने श्रृंगेरी पर हमला किया, ब्राह्मणों को पीटा, अन्य लोगों ने देवी शारदा की मूर्ति हटाई और मठ की संपत्ति लूटी... ऐसे पाप करने वालों को शीघ्र दंड मिलेगा। हमने सहायता भेजी है — धन, अनाज, उपहार। मूर्ति की पुनः प्रतिष्ठा कराई जाएगी।"
टीपू ने कई महीनों तक मदद भेजी — 200 रहती (सिक्के), अनाज, और मरम्मत के लिए संसाधन। उन्होंने 1791-1798 तक कुल 29 पत्र लिखे, मठ की सुरक्षा और पुनरुद्धार में सहयोग किया।
यह घटना युद्ध की क्रूरता दिखाती है — जहां धर्म, संप्रदाय से ऊपर लूट और हिंसा हावी हो जाती है। मराठा हिंदू थे, फिर भी उनके साथी दलों ने हिंदू मठ को लूटा। टीपू मुस्लिम थे, फिर भी उन्होंने हिंदू पीठ की रक्षा और मदद की।
इतिहास हमें सिखाता है: युद्ध में कोई भी पक्ष निर्दोष नहीं रहता। लूटपाट, अत्याचार सभी करते हैं — चाहे हिंदू राजा हों या मुस्लिम सुल्तान। लेकिन सच्चाई छिपाने या एक तरफा दोष देने से इतिहास नहीं बदलता।
श्रृंगेरी आज भी खड़ा है — माँ शारदा की कृपा से। उस दर्द को याद रखें, लेकिन नफरत से नहीं — सीख से। क्योंकि सच्चाई जानना ही असली देशभक्ति है।
(स्रोत: श्रृंगेरी मठ के पुराने पत्राचार, इतिहासकार A.K. शास्त्री, जी.एस. सरदेसाई, स्वराज्य मैगज़ीन, और अन्य प्रमाणित ऐतिहासिक रिकॉर्ड)
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