दादा कायम खां दिवस: इतिहास के गौरव में जीना है, या अतीत की गफ़लत में खोना है?
14 जून को हम सब दादा कायम खां दिवस मनाने जा रहे हैं। हर साल की तरह इस साल भी सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े पोस्टर्स लगेंगे, पूर्वजों के किस्से शेयर किए जाएंगे, और हमारी दिलेरी और वीरता के कसीदे पढ़े जाएंगे। एक कायमखानी होने के नाते, यह सब देखकर गर्व होना लाजिमी है। लेकिन आज इस मुबारक मौके पर, मैं आपसे कोई मीठी-मीठी बातें करने नहीं आया हूँ। आज वक्त है कि हम एक समाज के रूप में आईने के सामने खड़े हों और खुद से एक कड़वा सवाल पूछें: क्या हम सच में तरक्की कर रहे हैं, या हम सिर्फ " इतिहास की गफ़लत" में जी रहे हैं? ' सुप्रिमेसी' (श्रेष्ठता) का घमंड: एक दलदल हमारे समाज में एक अजीब सा घमंड घर कर गया है। हम खुद को दूसरी कौमों से 'सुप्रीम' (सर्वश्रेष्ठ) समझने लगते हैं क्योंकि हमारे पास एक शाही और सैनिक इतिहास है। हम अक्सर इस गुरूर में रहते हैं कि हमारे पूर्वज राजा थे, नवाब थे, और उन्होंने तलवार के दम पर रियासतें खड़ी कीं। लेकिन होश में आइए! पूर्वजों का इतिहास आपका अपना रिपोर्ट कार्ड नहीं है। 500 साल पहले किसी ने तलवार चलाई थी, तो उसकी वजह से आज आपको 21वीं सदी में कोई मु...