नकली किन्नरों का माफिया: टोल प्लाजा और ट्रैफिक सिग्नल्स पर बेगिंग का कड़वा सच और असली समाधान
आजकल हर हाईवे, टोल प्लाजा, रेड लाइट और ट्रेन-बस स्टेशन पर एक ही नजारा दिखता है — किन्नर (ट्रांसजेंडर) लोग हाथ फैलाकर पैसे मांगते हैं। कई बार जबरदस्ती, गाली-गलौज या मारपीट तक हो जाती है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि ये असली किन्नर हैं और इन्हें सहानुभूति मिलनी चाहिए। लेकिन हकीकत बहुत अलग है। इनमें से बड़ा हिस्सा नकली होता है — सामान्य युवा लड़के जो महिलाओं के कपड़े पहनकर, मेकअप करके बेगिंग का ऑर्गनाइज्ड बिजनेस चला रहे हैं। ये बेगिंग माफिया हैं, जो स्पेसिफिक इलाकों को कंट्रोल करते हैं।
असली किन्नर कम्युनिटी की हकीकत
सदियों पुरानी परंपरा: शादी, बच्चे के जन्म, नए घर जैसे शुभ मौकों पर बधाई देकर आशीर्वाद देते हैं और बदले में पैसे या गिफ्ट्स लेते हैं। ये बेगिंग नहीं, बल्कि कल्चरल प्रैक्टिस है।
आज भेदभाव, शिक्षा की कमी, नौकरी न मिलना, परिवार द्वारा अस्वीकार किए जाने की वजह से कई असली ट्रांसजेंडर लोग मजबूरी में ट्रैफिक सिग्नल्स, हाईवे या टोल प्लाजा पर बेगिंग करने को मजबूर हैं। लेकिन असली किन्नर आमतौर पर जबरदस्ती नहीं करते — वो “श्राप” या “कर्स” देने की बात करते हैं, जो उनकी परंपरा का हिस्सा है।
नकली किन्नरों का माफिया — असली खतरा पुलिस ने दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बैंगलोर, लुधियाना में कई बार ऐसे गैंग्स पकड़े हैं।
ये लोग ज्यादातर यूपी, बिहार, राजस्थान आदि से आते हैं और ऑर्गनाइज्ड तरीके से काम करते हैं। एक गैंग में 5–10 लोग होते हैं जो खास इलाकों को “कंट्रोल” करते हैं। अगर कोई पैसे नहीं देता तो गाड़ी रोककर, वॉलेट छीनकर, मारपीट तक कर देते हैं।
ये असली किन्नर कम्युनिटी की इमेज खराब करते हैं और लोगों में डर पैदा करते हैं।
मुरथल टोल प्लाजा का रियल केस — ऑपरेटर की जुबानी
मुरथल टोल प्लाजा (सोनीपत, हरियाणा) चलाने वाले एकऑपरेटर ने बताया:
वहां बहुत से किन्नर बीच लेन में बेगिंग करते हैं और टोल बूथ्स के पीछे खड़े रहते हैं। यह सिक्योरिटी का बहुत बड़ा खतरा है — कई बार एक्सीडेंट हो चुके हैं क्योंकि गाड़ियां अचानक रुक जाती हैं।
ऑपरेटर ने कई बार समझाया और टोल कलेक्टर की जॉब ऑफर की: मासिक 20,000 रुपये सैलरी + रहना-खाना फ्री।
कुछ पढ़े-लिखे लोग तैयार भी हो गए, लेकिन उनकी लीडर ने साफ मना कर दिया।
NHAI के कॉन्सेशन एग्रीमेंट के अनुसार, हर बेगिंग इंसिडेंट पर 10 लाख रुपये की पेनल्टी लग सकती है।
ऑपरेटर को लगातार पेनल्टी का डर रहता है, लेकिन समस्या खत्म नहीं हो रही।
यह केस बताता है कि समस्या सिर्फ सामाजिक नहीं — सड़क सुरक्षा, एक्सीडेंट रिस्क और कॉन्सेशन एग्रीमेंट से जुड़ी हुई है।
समस्या के असली कारण
समाज का भेदभाव — असली ट्रांसजेंडर को सम्मानजनक नौकरी और शिक्षा नहीं मिलती।
पुलिस और प्रशासन की नाकामी — फेक गैंग्स पर सख्त कार्रवाई कम होती है।
हमारी आदत — जबरदस्ती मांगे गए पैसे देकर हम इस सिस्टम को चलाते रहते हैं।
प्रैक्टिकल समाधान — क्या किया जा सकता है?
फेक लोगों पर तुरंत कार्रवाई
पुलिस को स्पेशल ऑपरेशन (जैसे हैदराबाद में डेकोय ऑपरेशन) चलाने चाहिए।
ट्रांसजेंडर लोगों को सरकारी आईडी कार्ड जारी करें ताकि असली और नकली में फर्क हो सके।
टोल प्लाजा पर CCTV, सिक्योरिटी गार्ड्स और लोकल पुलिस के साथ बेहतर कोऑर्डिनेशन।
NHAI को ko State Support agreement ko Implement karwana Chaiye aur ऑपरेटर्स को सपोर्ट करना चाहिए।
असली ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के लिए सपोर्ट
जॉब रिजर्वेशन, स्किल ट्रेनिंग और ट्रैफिक असिस्टेंट, हेल्पलाइन, NGO जॉब्स जैसे प्रोजेक्ट्स।
शिक्षा, स्वास्थ्य, हॉस्टल और स्कॉलरशिप्स।
बधाई परंपरा को सम्मान दें, लेकिन जबरदस्ती बेगिंग को सख्ती से रोकें।
मुरथल जैसे केस में कम्युनिटी लीडर्स को शामिल करके बातचीत करें।
हम सबकी जिम्मेदारी
जबरदस्ती मांगे गए पैसे न दें — इग्नोर करें या पुलिस को रिपोर्ट करें (100 डायल करें)।
टोल प्लाजा या रेड लाइट पर बेगिंग से खतरा हो तो NHAI/ट्रैफिक पुलिस को कंप्लेन करें।
ट्रैफिक पुलिस को रेड लाइट्स और टोल्स पर नियमित चेकिंग करनी चाहिए।
अंत में
यह मुद्दा सिर्फ “किन्नरों” का नहीं है — यह समाज, सड़क सुरक्षा और सिस्टम की नाकामी है।
फेक माफिया को जेल भेजें, असली लोगों को सम्मान और रोजगार दें।
मुरथल जैसे केस दिखाते हैं कि अच्छे इरादे से जॉब ऑफर करने पर भी लीडरशिप ब्लॉक कर सकती है — इसलिए समाधान में कम्युनिटी लीडर्स को भी शामिल करना जरूरी है।
अगर हम सब मिलकर काम करें, तो हाईवे, टोल प्लाजा और सिग्नल्स पर डर की जगह सम्मान होगा।
आपके इलाके में क्या स्थिति है?
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